नेपाल में ग्लेशियर का दो-तिहाई हिस्सा ढहा, 5,200 मीटर से 1,200 मीटर नीचे का मलबा खतरनाक प्रभाव छोड़ रहा है

Rajkumar Dhiman, Dehradun: एनआरएससी के उपग्रह विश्लेषण में ग्लेशियर टूटने के बाद नदी अवरुद्ध होने और अचानक पानी-मलबा निकलने की कड़ी सामने आई; आइसीआइएमओडी ने ल्हेंडे खोला में आइस-रॉक एवलांच को संभावित ट्रिगर माना, यूएसजीएस के अनुसार दर्ज 5.2 का भूकंपीय संकेत खुद ग्लेशियल ढहने और मलबा प्रवाह से पैदा हुआ नेपाल के रसुवा जिले … The post नेपाल में ग्लेशियर का करीब दो-तिहाई हिस्सा ढहा, 5,200 मीटर से 1,200 मीटर नीचे आया बर्फ-चट्टान का मलबा appeared first on Round The Watch.

Aug 28, 2026 - 09:37
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नेपाल में ग्लेशियर का दो-तिहाई हिस्सा ढहा, 5,200 मीटर से 1,200 मीटर नीचे का मलबा खतरनाक प्रभाव छोड़ रहा है
नेपाल में ग्लेशियर का दो-तिहाई हिस्सा ढहा, 5,200 मीटर से 1,200 मीटर नीचे का मलबा खतरनाक प्रभाव छोड़ रहा है

नेपाल में ग्लेशियर का दो-तिहाई हिस्सा ढहा, 5,200 मीटर से 1,200 मीटर नीचे का मलबा खतरनाक प्रभाव छोड़ रहा है

कम शब्दों में कहें तो: नेपाल के रसुवा जिले में एक विनाशकारी बाढ़ के कारण ग्लेशियर का दो-तिहाई हिस्सा ढह गया, जिससे अचानक पानी-मलबा निकलने की स्थिति पैदा हुई। एनआरएससी के उपग्रह विश्लेषण ने इसके पीछे के कारणों को उजागर किया है। Breaking News, Daily Updates & Exclusive Stories - Netaa Nagari

राजकुमार धिमान, देहरादून: नेपाल में 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ ने कई गंभीर समस्याओं को उजागर किया है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (एनआरएससी) के नवीनतम अध्ययन के अनुसार, नेपाल-तिब्बत सीमा पर स्थित ग्लेशियर का दो-तिहाई हिस्सा टूटकर नीचे आ गया है। इसके परिणामस्वरूप पानी और मलबा भोटेकॉशी व त्रिशूली नदी तंत्र में अचानक फैल गया, जिससे भारी नुकसान हुआ। आइसीआइएमओडी ने ल्हेंडे खोला में आइस-रॉक एवलांच को संभावित ट्रिगर माना है।

उपग्रह तस्वीरों का विश्लेषण

एनआरएससी ने रिसोर्ससैट-2ए के माध्यम से 26 अगस्त को भारतीय समयानुसार 10:30 बजे प्राप्त तस्वीरों का मूल्यांकन किया। इन तस्वीरों की तुलना 24 अगस्त के चित्रों से की गई। नतीजतन, यह स्पष्ट हुआ कि ग्लेशियर का एक विशाल हिस्सा फिसल गया है, जिससे नदी का प्रवाह रुक गया था। इससे पहले वाली तस्वीरों के अनुसार यह क्षेत्र पूरी तरह से हिमानुकूल था, लेकिन बाद की तस्वीरों में आइस-रॉक एवलांच और उसके बाद की स्थिति से यह स्पष्ट हो गया कि इलाके में बड़ा बदलाव हुआ है।

ग्लेशियर का मलबा और प्रभाव

विशेषज्ञों के अनुसार, यह ग्लेशियर लगभग 5,200 मीटर की ऊंचाई से 1,200 मीटर नीचे आ गिरा है। कैलगरी विश्वविद्यालय के पृथ्वी वैज्ञानिक डैन शुगर के अनुसार, इस घटना से पहले के 24 घंटों में ऊंचाई वाले क्षेत्र में काफी बर्फ पिघलने के संकेत मिले थे। सिक्किम विश्वविद्यालय के भूविज्ञान विशेषज्ञ विक्रम गुप्ता ने भी इस घटना की गंभीरता का उल्लेख किया है, जिससे स्पष्ट होता है कि जलवायु परिवर्तन और गर्म मौसम ने इस तरह की घटनाओं को बढ़ावा दिया है।

ल्हेंडे खोला में आइस-रॉक एवलांच

आइसीआइएमओडी और नेपाल-चीन के साझेदार संस्थानों ने अपनी प्रारंभिक जांच में ल्हेंडे खोला को ध्यान में रखा है, जहाँ से बर्फ-चट्टान का मलबा बेहद तेजी से नीचे बहा। इससे पानी के साथ भारी मात्रा में तलछट भी आगे बढ़ी, जो कि भोटेकोशी की सहायक नदी थी। यह संकट केवल एक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि कई घटनाओं का परिणाम है।

नदी अवरोध का खतरा

ग्लेशियर के टूटने और इसके परिणामस्वरूप नदी में संभावित अवरोध के निर्माण का खतरा विशेषज्ञों के लिए चिंता का विषय है। यह मलबा अस्थायी रूप से एक प्राकृतिक बांध बना सकता है, जिससे भविष्य में भीषण बाढ़ का खतरा उत्पन्न हो सकता है। इस प्रकार, वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लेशियर का ढहना और उसके बाद की बाढ़ एक व्यवस्थित आपदा श्रृंखला का हिस्सा है।

जल स्तर का अचानक बढ़ना

आइसीआइएमओडी के हाइड्रोलॉजिकल आंकड़ों के अनुसार, जल स्तर में अचानक वृद्धि हुई, जहाँ त्रिशूली नदी के गल्छी स्टेशन पर केवल 30 मिनट में जल स्तर 9 मीटर बढ़ गया। इससे भोटेकोशी से त्रिशूली और नारायणी नदी तंत्र में अतिरिक्त जल प्रवाह उत्पन्न हुआ, जो आगे लगभग 168 किलोमीटर की दूरी तक पहुँच गया।

भूकंप और ग्लेशियर संबंध

इस घटना को लेकर भूकंप संबंधी विश्लेषण भी महत्वपूर्ण है। नेपाल के राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र ने 4.9 की तीव्रता का भूकंप रिकॉड किया था, जिसमें यह सामान्य स्वरूप से भिन्न था। लेकिन कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि भूकंप ने ग्लेशियर को तोड़ा या यह स्वयं ग्लेशियर के ढहने से उत्पन्न भूकंपीय संकेत थे।

जलवायु परिवर्तन की भूमिका

संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार, नेपाल के ग्लेशियर पिछले तीन दशकों में एक तिहाई बर्फ खो चुके हैं। यह साबित करता है कि जलवायु परिवर्तन इसके पीछे एक आवश्यक कारक है, हालाँकि पृथक रूप से इस आपदा से जोड़ना उचित नहीं होगा।

दूसरे खतरे की संभावना

पहली बाढ़ के बाद भी खतरा खत्म नहीं हुआ है। चीन-नेपाल सीमा के ऊपरी क्षेत्र में मलबे से एक और अवरोध संभवतः जल भराव कर रहा है। इसकी भविष्यवाणी सभी विशेषज्ञों की आंखों में एक नई चिंता का विषय है।

वैज्ञानिकों के लिए शिक्षा

यह घटना हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन और उससे जुड़ी अनेक चुनौतियों को स्पष्ट करती है। आइसीआइएमओडी ने सीमापार रीयल-टाइम निगरानी और चेतावनी प्रणाली का सुझाव दिया है ताकि स्थानीय समुदायों को समय पर जानकारी मिल सके।

इसलिए, स्पष्ट है कि वैज्ञानिक अनुसंधान की महत्ता है और हमें इस दिशा में अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। अधिक अपडेट के लिए हमारी वेबसाइट पर जाएँ। लेख को समाप्त करते हुए, टीम नेटा नगरी की ओर से, सुमिता शर्मा

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