देहरादून के 66वें डीएम आशीष चौहान: इतिहास और प्रशासनिक पहल

Rajkumar Dhiman, Dehradun: वर्ष 2012 बैच के आइएएस (भारतीय प्रशासनिक सेवा) आशीष चौहान ने देहरादून के 66वें जिलाधिकारी के रूप में कमान संभाली है। उन्होंने वर्ष 2009 बैच के आइएएस अधिकारी सविन बंसल की जगह ली। पदभार ग्रहण करने के बाद ही नवनियुक्त जिलाधिकारी बंसल से अपने प्राथमिकता और प्रतिबद्ध स्पष्ट करते हुए कहा कि … The post कौन थे दून के पहले डीएम? 66वें डीएम बने आशीष, जानिए दून की प्रशासनिक व्यवस्था में सब कुछ appeared first on Round The Watch.

May 25, 2026 - 18:37
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देहरादून के 66वें डीएम आशीष चौहान: इतिहास और प्रशासनिक पहल
देहरादून के 66वें डीएम आशीष चौहान: इतिहास और प्रशासनिक पहल

कौन थे दून के पहले डीएम? 66वें डीएम बने आशीष चौहान, जानिए दून की प्रशासनिक व्यवस्था में सब कुछ

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कम शब्दों में कहें तो, आशीष चौहान ने देहरादून के 66वें जिलाधिकारी के रूप में कमान संभाली है, साथ ही उन्होंने जमाना प्रशासन की चुनौतियों को संभालने के लिए अपनी प्रतिबद्धता को स्पष्ट किया है।

राजकुमार धीमान, देहरादून: वर्ष 2012 बैच के आइएएस (भारतीय प्रशासनिक सेवा) अधिकारी आशीष चौहान ने हाल ही में देहरादून के 66वें जिलाधिकारी के रूप में कार्यभार संभाला है। उन्होंने 2009 बैच के आइएएस अधिकारी सविन बंसल का स्थान लिया। आशीष चौहान ने अपने पदभार ग्रहण करते ही कहा कि उनका मुख्य उद्देश्य अंतिम छोर पर बैठे व्यक्तियों तक सरकार की कल्याणकारी योजनाओं का लाभ पहुँचाना होगा। इस दिशा में उन्होंने भूमाफिया के खिलाफ कठोर कदम उठाने का संकेत भी दिया। नागरिकों के हितों की रक्षा बनाने में जिलाधिकारी की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण होती है। आइए जानते हैं देहरादून के जिलाधिकारी बनने के इतिहास के बारे में।

देहरादून का प्रशासनिक इतिहास

देहरादून की पहचान ब्रिटिश काल से ही विशेष रही है, जब यह पूर्व में उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से जुड़ा हुआ था। वर्ष 1871 में इसे एक अलग जिले के रूप में मान्यता मिली। जिलाधिकारी की ताजपोशी की प्रक्रिया वर्ष 1935 से शुरू हुई, जब 26 अक्टूबर 1935 को बीजीके हलोवस को जिला मजिस्ट्रेट नियुक्त किया गया। तब से लेकर अब तक देहरादून में 65 जिलाधिकारी तैनात किए जा चुके हैं।

उत्तर प्रदेश से अलग होकर 09 नवंबर 2000 को उत्तराखंड राज्य के गठन के समय, निवेदिता शुक्ला वर्मा देहरादून की पहली जिलाधिकारी बनीं। तब से आज तक देहरादून को 22 जिलाधिकारी मिल चुके हैं। यहाँ एक जिलाधिकारी का औसत कार्यकाल लगभग एक वर्ष का रहा है, जो संकेत करता है कि प्रशासन की जटिलताओं को समझने और सुधारने में यह समय बहुत सीमित होता है।

आइएएस बनाम आईसीएस: एक ऐतिहासिक तुलना

भले ही विकास की धारा में कई परिवर्तन आए हों, लेकिन इंडियन सिविल सर्विस (आईसीएस) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही है। यह प्रणाली ब्रिटिश शासन के दौरान, 1858 से 1947 के बीच अस्तित्व में थी। भारतीयों के लिए इसका प्रवेश काफी कठिन था, लेकिन 1922 के बाद यह संभव हो पाया। इसके बाद, वर्ष 1950 में आइएएस का उदय हुआ और यह भारतीय प्रशासन की मुख्य धारा बन गया।

आशीष चौहान का प्रशासनिक करियर

आशीष चौहान, जो कि राजस्थान के मूल निवासी हैं, अपनी जनसम्पर्क और सख्त प्रशासनिक छवि के लिए जाने जाते हैं। उनके पास इतिहास में बीए, बीएड, एमए, और पीएचडी की डिग्री हैं। उत्तराखंड कैडर में आने के बाद, उन्होंने नैनीताल और चमोली में ज्वाइंट मजिस्ट्रेट के रूप में कार्य किया है और उत्तरकाशी, पिथौरागढ़ और पौड़ी जैसे संवेदनशील जिलों में जिलाधिकारी के रूप में अपनी सेवाएँ दी हैं।

2018 में उत्तरकाशी में डीएम रहते उन्होंने एक विदेशी पर्वतारोही के रेस्क्यू में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, जिससे वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान प्राप्त कर चुके हैं। पौड़ी में उनके कार्यकाल के दौरान ग्रामीण विकास और स्थानीय पर्यटन को बढ़ावा देने की कई पहलों को सफलतापूर्वक लागू किया गया।

आगे की चुनौतियाँ और दृष्टिकोण

अब देहरादून में, आशीष चौहान के सामने कई महत्वपूर्ण चुनौतियाँ हैं जैसे ट्रैफिक प्रबंधन, अतिक्रमण, अवैध निर्माण, और स्मार्ट सिटी परियोजनाओं का कार्यान्वयन। यह तब आता है जब शहर तेजी से विस्तार और शहरी दबाव का सामना कर रहा है। उनकी प्रशासनिक क्षमता और फील्ड ओरिएंटेड दृष्टिकोण को देखते हुए, उन्हें राजधानी देहरादून की कमान सौंपना एक महत्वपूर्ण निर्णय माना जा रहा है।

आशीष चौहान को एक ऊर्जावान, सुलभ और विपणन से जुड़े अधिकारी के रूप में जाना जाता है, और उनकी नियुक्ति को सरकार की प्रशासनिक रणनीति के एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है।

इसके अलावा, आशीष चौहान ने अपनी प्राथमिकताओं में जनसंवाद को भी शामिल किया है, जो उनके प्रशासनिक दृष्टिकोण की सफलता की कुंजी हो सकता है।

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सादर, टीम नेटा नागरी, साक्षी शर्मा

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