केदारताल ट्रेक पर 02 शव मिले, 06 ट्रेकर्स की तलाश जारी

Rajkumar Dhiman, Dehradun: उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्र में ट्रेकिंग की बढ़ती गतिविधियों के बीच हादसों का सिलसिला थम नहीं रहा है। गंगोत्री से केदारताल ट्रेक पर निकले दल के 08 सदस्यों के हिमस्खलन की चपेट में आने के बाद अब 02 के शव बरामद हुए हैं। इनमें 01 महिला और 01 पुरुष शामिल हैं। दोनों … The post केदारताल ट्रेक पर 02 शव मिले, 06 ट्रेकर्स की तलाश जारी appeared first on Round The Watch.

Nov 4, 2026 - 00:37
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केदारताल ट्रेक पर 02 शव मिले, 06 ट्रेकर्स की तलाश जारी

Rajkumar Dhiman, Dehradun: उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्र में ट्रेकिंग की बढ़ती गतिविधियों के बीच हादसों का सिलसिला थम नहीं रहा है। गंगोत्री से केदारताल ट्रेक पर निकले दल के 08 सदस्यों के हिमस्खलन की चपेट में आने के बाद अब 02 के शव बरामद हुए हैं। इनमें 01 महिला और 01 पुरुष शामिल हैं। दोनों की पहचान अभी नहीं हो सकी है। शेष 06 सदस्यों की तलाश जारी है। 04 दिन से चल रहे अभियान में एसडीआरएफ और नेहरू पर्वतारोहण संस्थान (एनआईएम) की टीमें लगातार दुर्गम क्षेत्र में खोज कर रही हैं। मंगलवार को खराब मौसम के कारण दोपहर बाद अभियान रोकना पड़ा।

12 सदस्यीय दल 27 अक्टूबर को गंगोत्री से केदारताल के लिए रवाना हुआ था। इसमें पश्चिम बंगाल के पांच पुरुष ट्रेकर, उत्तर प्रदेश की दो महिला ट्रेकर, उत्तरकाशी का स्थानीय गाइड सिद्धार्थ राणा, एक कुक और तीन नेपाली पोर्टर शामिल थे। 29 अक्टूबर को वापसी के दौरान भोजखड़क और कच्ची ढांग के बीच अचानक हिमस्खलन और बर्फबारी हुई। इसकी चपेट में आठ सदस्य आ गए, जबकि चार सहयोगी सदस्य सुरक्षित गंगोत्री पहुंचने में सफल रहे। उन्होंने 30 अक्टूबर को प्रशासन को घटना की जानकारी दी। इसके बाद 31 अक्टूबर से खोज अभियान शुरू किया गया। घटनास्थल के आसपास टेंट, कपड़े और अन्य सामान भी मिला।

लापता लोगों में उत्तरकाशी के 25 वर्षीय गाइड सिद्धार्थ राणा, उत्तर प्रदेश की 28 वर्षीय वर्तिका वर्मा और एक अन्य महिला ट्रैकर शामिल हैं। पश्चिम बंगाल के बांकुरा निवासी तापस बौरी (30), रतन घोष (23), मनोज खवास (39), रिंटू मंडल (40) और उदय घोष (30) भी दल का हिस्सा थे। इनमें मनोज केशरा गांव और अन्य चार शालबनी के रहने वाले हैं। मंगलवार को बरामद दोनों शवों की पहचान नहीं हुई थी।

परिजनों की चिंता के बीच गाइड सिद्धार्थ के पिता मोहन राणा और ग्रामीण जिलाधिकारी प्रशांत कुमार आर्य से मिले। उन्होंने सेना और वायुसेना के उन्नत हेलीकाप्टरों को अभियान में शामिल करने की मांग की। मोहन राणा के अनुसार, दल के पास दो से तीन दिन का खाद्य और अन्य जरूरी सामान था। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने भी इंटरनेट मीडिया मंच एक्स पर चिंता जताते हुए उत्तराखंड प्रशासन से रिपोर्ट मांगी और युवकों की तलाश तेज करने की अपील की।

ट्रेकिंग हादसों का पुराना रिकॉर्ड भी चिंताजनक
केदारताल की घटना उत्तराखंड में पहली नहीं है। पिछले वर्षों में हिमस्खलन, अचानक मौसम बदलने, अत्यधिक ठंड, रास्ता भटकने और ऊंचाई पर स्वास्थ्य बिगड़ने से कई पर्वतारोहियों और ट्रैकरों की जान जा चुकी है। वर्ष 2022 में द्रौपदी का डांडा हादसा और 2024 में सहस्त्रताल दुर्घटना इसकी सबसे बड़ी मिसाल हैं।

उत्तराखंड में प्रमुख ट्रेकिंग और पर्वतारोहण हादसे
2018-19: आठ मौतों से शुरू हुआ दर्ज हादसों का सिलसिला

2018, हरकीदून ट्रेक, उत्तरकाशी: चार अक्टूबर को कोलकाता निवासी 48 वर्षीय तपस कुमार की हृदयाघात से मौत हो गई। वह छह सदस्यीय दल के साथ लौट रहे थे। वन और राजस्व विभाग की टीम ने शव निकालने तथा अन्य सदस्यों को वापस लाने के लिए अभियान चलाया।

2019, नंदा देवी ईस्ट, पिथौरागढ़: 13 मई को मुनस्यारी से निकले आठ सदस्यीय पर्वतारोहण दल के सदस्य 26 मई को हिमस्खलन में लापता हो गए। दल में सात विदेशी पर्वतारोही और भारतीय पर्वतारोहण फाउंडेशन के संपर्क अधिकारी चेतन पांडेय थे। 23 जून को सात शव बरामद किए गए। एक सदस्य का पता नहीं चला।

2021: हिमपात और हिमस्खलन ने ली कई जानें
लमखागा पास, उत्तरकाशी: अक्टूबर में हर्षिल से छितकुल जा रहा पश्चिम बंगाल का 11 सदस्यीय दल खराब मौसम में फंस गया। सात सदस्यों की मौत की पुष्टि हुई, जबकि दो लापता रहे। दो को बचाया गया।

सुंदरढूंगा ग्लेशियर, बागेश्वर: अक्टूबर में हिमस्खलन की चपेट में आए ट्रेकिंग दल के पांच सदस्यों की मौत हुई। शुरुआती रिपोर्टों में चार मौतें और दो लापता बताए गए थे, बाद की रिपोर्टों में पांच मौतों का उल्लेख आया।

पिंडारी ग्लेशियर, बागेश्वर: खराब मौसम में फंसे 34 लोगों को सुरक्षित निकाला गया। इनमें छह विदेशी नागरिक थे। कफनी ग्लेशियर, बागेश्वर: बकरियां चराने गए 19 स्थानीय लोगों को बचाया गया।

आईटीबीपी पोर्टर हादसा, उत्तरकाशी: भारत-चीन सीमा पर तैनात आईटीबीपी के तीन पोर्टरों की भी बर्फबारी के दौरान मौत हुई थी। इस प्रकार 2021 में अलग-अलग घटनाओं में पर्यटकों, पर्वतारोहियों और पोर्टरों को मिलाकर मृतकों की संख्या अलग-अलग रिपोर्टिंग चरणों में 12 से 15 तक बताई गई।

2022: द्रौपदी का डांडा हादसे में 28 मौतें
द्रौपदी का डांडा-द्वितीय, उत्तरकाशी: चार अक्टूबर को एनआईएम का 41 सदस्यीय प्रशिक्षण दल हिमस्खलन की चपेट में आ गया। इसमें 34 प्रशिक्षु और सात प्रशिक्षक थे। शुरुआती बचाव अभियान में 27 शव बरामद हुए। अक्टूबर 2023 में एक और लापता पर्वतारोही का शव मिलने के बाद मृतकों की संख्या 28 हो गई। एक सदस्य का पता नहीं चल सका।

इसके अलावा भी इसी वर्ष कई ट्रेक पर मौतें हुईं
खिमलोगा पास, उत्तरकाशी: पांच सितंबर को कोलकाता के 42 वर्षीय सुजॉय दुले की ग्लेशियर की दीवार से उतरते समय मौत हुई। एक साथी घायल हुआ और तीन पोर्टरों को बचाया गया।

रांसी-केदारनाथ ट्रैक, रुद्रप्रयाग: 10 अक्टूबर को पश्चिम बंगाल के एक ट्रेकर की मौत हुई। पनार बुग्याल-रुद्रनाथ, चमोली: 19 अक्टूबर को सात सदस्यीय दल का एक ट्रेकर मृत मिला। अन्य छह सदस्य फंसे हुए थे।

मद्महेश्वर ट्रैक, रुद्रप्रयाग: 19 अक्टूबर को पश्चिम बंगाल के 47 वर्षीय निर्मल दिरवाह की अत्यधिक ठंड के कारण तबीयत बिगड़ने से मौत हुई।

2023: ग्लेशियर और ऊंचाई पर स्वास्थ्य बिगड़ने से मौतें
रुनसारा ताल, उत्तरकाशी: इस ट्रेक पर दो ट्रेकर की मौत हुई।
गंगोत्री-कालिंदीखाल, उत्तरकाशी: एक ट्रेकर की मौत हुई। इस प्रकार इन दो ट्रेकिंग अभियानों में तीन मौतें दर्ज हुईं।

कालिंदीखाल ट्रेक, उत्तरकाशी: जून में ट्रेकिंग दल के गाइड बिपेंद्र उर्फ बिपिन राणा की आधार शिविर में तबीयत बिगड़ने से मौत हुई। अन्य सदस्य सुरक्षित लौटे।

भागीरथी-द्वितीय पर्वतारोहण अभियान, उत्तरकाशी: जुलाई में 27 सदस्यीय दल के साथ गए एक पोर्टर की हिमस्खलन में मौत हो गई।

2024: सहस्त्रताल हादसे में नौ मौतें
गौमुख, उत्तरकाशी: 16 मई को पंजाब के एक ट्रेकर की मौत हुई।

धूमधार कांडी ट्रेक, उत्तरकाशी: मई में पश्चिम बंगाल के देवरत नामक ट्रेकर की हृदयाघात से मौत हुई। 23 सदस्यीय दल के बाकी सदस्य सुरक्षित थे।

रुइंसारा-देवसू बुग्याल, उत्तरकाशी: 26 मई को पश्चिम बंगाल के एक ट्रेकर की मौत हुई।

सहस्त्रताल, उत्तरकाशी-टिहरी सीमा: 29 मई को सिल्ला गांव से 22 सदस्यीय दल रवाना हुआ था। वापसी के दौरान जून के पहले सप्ताह में खराब मौसम के कारण दल रास्ता भटक गया। नौ सदस्यों की मौत हुई और 13 को सुरक्षित निकाला गया। बचाव अभियान में एसडीआरएफ, एनडीआरएफ, सेना, वायुसेना, आईटीबीपी और वन विभाग की टीमें शामिल हुईं।

2025: माणा हिमस्खलन में आठ श्रमिकों की मौत
माणा, चमोली: 28 फरवरी को सड़क निर्माण कार्य में लगे श्रमिकों का शिविर हिमस्खलन की चपेट में आ गया। कुल 54 लोग प्रभावित हुए। 46 को सुरक्षित निकाला गया और आठ की मौत हुई। एनडीआरएफ ने चार टीमों और प्रशिक्षित खोजी कुत्तों के साथ अभियान चलाया। यह ट्रेकिंग हादसा नहीं, बल्कि उच्च हिमालय में कार्यस्थल पर हुई हिमस्खलन दुर्घटना थी।

2026: सितंबर में 67 लोगों का रेस्क्यू, अब केदारताल हादसा
ऑडेन कोल, कालिंदी खाल, माउंट जोगिन और वासुकीताल, उत्तरकाशी: सितंबर के अंतिम सप्ताह में भारी बर्फबारी के कारण कई ट्रैकिंग दल फंस गए। उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने 28 सितंबर को उत्तरकाशी में 137 लोगों के फंसे होने और उनमें से 40 को सुरक्षित निकाले जाने की जानकारी दी थी। इसके बाद अलग-अलग अभियानों में ऑडेन कोल से 29, कालिंदी खाल से 19, माउंट जोगिन से आठ और वासुकीताल से 11 लोगों को सुरक्षित निकालने की सूचना प्रकाशित हुई। इन चार समूहों का जोड़ 67 है। यह सितंबर अभियान का अलग-अलग ट्रेक पर दर्ज रेस्क्यू आंकड़ा है, पूरे 137 लोगों के अभियान का अंतिम कुल नहीं।

केदारताल, उत्तरकाशी: 29 अक्टूबर को हिमस्खलन में आठ सदस्य लापता हुए। तीन नवंबर को एक महिला और एक पुरुष के शव बरामद हुए। छह की तलाश जारी है।

ट्रेकिंग सुरक्षा पर सबसे बड़ा सवाल
केदारताल हादसे में एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आया है। गंगोत्री क्षेत्र में आने वाले ट्रेकर्स में करीब 95 प्रतिशत गोमुख मार्ग पर जाते हैं, जबकि केदारताल पर आवाजाही अपेक्षाकृत कम है। गोमुख मार्ग पर नियमित निगरानी होती है, लेकिन केदारताल जैसे कम आवाजाही वाले ट्रेक पर निगरानी उतनी नियमित नहीं है।

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या अनुमति लेने के बाद ट्रेकिंग दल की वास्तविक लोकेशन, मौसम की स्थिति और वापसी की समयसीमा पर प्रशासन की निगरानी पर्याप्त है? क्या प्रत्येक दल के गाइड और पोर्टर का पंजीकरण, सैटेलाइट संचार उपकरण और आपातकालीन संपर्क व्यवस्था अनिवार्य है? क्या मौसम अलर्ट मिलने के बाद जोखिम वाले मार्गों पर आवाजाही रोकने का प्रभावी तंत्र है?

क्योंकि, उत्तराखंड में ट्रेकिंग को पर्यटन की संभावनाओं के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन उच्च हिमालय में सुरक्षा व्यवस्था, प्रशिक्षित गाइड, मौसम निगरानी, परमिट सत्यापन और त्वरित बचाव तंत्र को उसी अनुपात में मजबूत करना जरूरी है। केदारताल की घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या प्रदेश में ट्रेकिंग गतिविधियों की निगरानी हादसे के बाद ही सक्रिय होती है?

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