नगर निगम में बिना दस्तावेज दूसरे के नाम चढ़ा दी संपत्ति, 02 अफसरों पर 10 हजार का जुर्माना
Rajkumar Dhiman, Dehradun: नगर निगम देहरादून की संपत्ति रिकॉर्ड व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है। जिस संपत्ति के ऑनलाइन रिकॉर्ड में विनोद कुमार अग्रवाल और प्रदीप कुमार अग्रवाल के नाम दर्ज पाए गए, उनके नाम दर्ज किए जाने से संबंधित कोई दस्तावेज नगर निगम के कार्यालय या रिकॉर्ड में मौजूद … The post नगर निगम में बिना दस्तावेज दूसरे के नाम चढ़ा दी संपत्ति, 02 अफसरों पर 10 हजार का जुर्माना appeared first on Round The Watch.
Rajkumar Dhiman, Dehradun: नगर निगम देहरादून की संपत्ति रिकॉर्ड व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करने वाला मामला सामने आया है। जिस संपत्ति के ऑनलाइन रिकॉर्ड में विनोद कुमार अग्रवाल और प्रदीप कुमार अग्रवाल के नाम दर्ज पाए गए, उनके नाम दर्ज किए जाने से संबंधित कोई दस्तावेज नगर निगम के कार्यालय या रिकॉर्ड में मौजूद नहीं था। हैरानी की बात यह भी है कि नगर निगम ने सूचना आयोग के समक्ष स्वीकार किया कि इस संपत्ति के नामांतरण की कोई विधिवत प्रक्रिया ही नहीं अपनाई गई और न ही नामांतरण से संबंधित कोई नोटिस जारी किया गया।
मामला शिकायतकर्ता रविंद्र गोयल की ओर से की गई शिकायत से जुड़ा है। उन्होंने आरोप लगाया था कि वर्ष 2014 से 2020 के असेसमेंट रजिस्टर में प्रदीप कुमार अग्रवाल और विनोद कुमार अग्रवाल के नाम अनिवार्य म्यूटेशन प्रक्रिया पूरी किए बिना दर्ज कर दिए गए। शिकायत पर उत्तराखंड सूचना आयोग ने नगर निगम से जवाब मांगा।
सुनवाई के दौरान नगर निगम के रिकॉर्ड की पड़ताल में सामने आया कि दोनों व्यक्तियों के नाम दर्ज किए जाने के आधार से संबंधित कोई अभिलेख संरक्षित ही नहीं है। यानी निगम के पास यह बताने के लिए कोई दस्तावेज नहीं था कि आखिर किस आधार और किस प्रक्रिया के तहत संपत्ति रिकॉर्ड में दोनों के नाम दर्ज किए गए।
आपत्ति के बाद मांगे दस्तावेज, नहीं हुए उपलब्ध
नगर निगम ने आयोग को बताया कि शिकायतकर्ता की आपत्ति के बाद 20 जनवरी 2026 को विनोद कुमार अग्रवाल और प्रदीप कुमार अग्रवाल से संपत्ति के स्वामित्व से संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराने को कहा गया था। हालांकि, दोनों की ओर से कार्यालय में कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराया गया।
इस संपत्ति के स्वामित्व को लेकर विवाद भी न्यायालय में लंबित है। नगर निगम के अनुसार सिविल जज (जूनियर डिवीजन), देहरादून की अदालत में वाद संख्या 189/2024 और 341/2025 में मामला विचाराधीन है।
आयोग ने इस मामले में एक महत्वपूर्ण स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि भवनकर बिल में किसी व्यक्ति का नाम दर्ज होना अपने आप में संपत्ति के स्वामित्व अथवा वैधानिक मालिकाना हक का निर्धारण नहीं करता।
नामांतरण का खेल, ठीकरा डाटा एंट्री ऑपरेटर पर
मामले में नगर निगम ने यह भी बताया कि वर्ष 2020-21 में तत्कालीन डाटा एंट्री ऑपरेटर ने बिना दस्तावेज प्राप्त किए और बिना निर्धारित प्रक्रिया अपनाए सॉफ्टवेयर में नाम परिवर्तन कर दिया था। शिकायतें सामने आने के बाद संबंधित आउटसोर्स कर्मचारी को वर्ष 2021-22 में ही काम से हटा दिया गया।
इस तरह रिकॉर्ड में नाम दर्ज होने की गंभीर गड़बड़ी सामने आने के बावजूद कार्रवाई का दायरा मुख्य रूप से उस आउटसोर्स कर्मचारी तक सीमित रहा, जो अब नगर निगम में कार्यरत नहीं है। वहीं, रिकॉर्ड में नाम दर्ज करने की प्रक्रिया और उसकी निगरानी को लेकर भी सवाल खड़े हो गए हैं।
आरटीआई आदेशों की अनदेखी पर दो अधिकारियों पर जुर्माना
मामले की सुनवाई के दौरान सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत जारी आदेशों के अनुपालन में लापरवाही भी सामने आई। उत्तराखंड सूचना आयोग ने इसे गंभीरता से लेते हुए तत्कालीन लोक सूचना अधिकारी गौरव भसीन, जो उस समय अधिशासी अधिकारी, नगर पालिका परिषद मसूरी के पद पर तैनात थे, और वर्तमान लोक सूचना अधिकारी विनय प्रताप सिंह, सहायक नगर आयुक्त, नगर निगम देहरादून पर 5-5 हजार रुपये का जुर्माना लगा दिया।
आयोग ने निर्देश दिया है कि जुर्माने की राशि तीन माह के भीतर राजकोष में जमा कराई जाए। यदि निर्धारित अवधि में राशि जमा नहीं कराई जाती है तो संबंधित अधिकारियों के देयकों से कटौती कर रकम राजकोष में जमा कराने की कार्रवाई के लिए निदेशक, शहरी विकास निदेशालय को अवगत कराया जाएगा। आयोग ने भविष्य में सूचना के अधिकार अधिनियम से जुड़े मामलों में इस तरह की लापरवाही नहीं बरतने की चेतावनी भी दी है।
ऑनलाइन रिकॉर्ड में नाम, लेकिन आधार का रिकॉर्ड गायब
पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब नामांतरण से संबंधित कोई दस्तावेज निगम के रिकॉर्ड में मौजूद नहीं था, नामांतरण की प्रक्रिया भी नहीं अपनाई गई और कोई नोटिस भी जारी नहीं हुआ, तो संपत्ति के ऑनलाइन रिकॉर्ड में विनोद कुमार अग्रवाल और प्रदीप कुमार अग्रवाल के नाम आखिर किस आधार पर दर्ज हो गए।
नगर निगम की ओर से इसका जिम्मेदार तत्कालीन डाटा एंट्री ऑपरेटर को बताया गया है। लेकिन यह मामला केवल एक कर्मचारी की गलती तक सीमित नहीं माना जा सकता, क्योंकि इससे नगर निगम के संपत्ति रिकॉर्ड में डेटा दर्ज करने की प्रक्रिया, दस्तावेजों के सत्यापन और निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
फिलहाल संपत्ति के स्वामित्व का विवाद न्यायालय में लंबित है। वहीं, सूचना के अधिकार से जुड़े आदेशों के अनुपालन में लापरवाही के लिए आयोग ने दो अधिकारियों पर जुर्माना लगाकर यह संदेश भी दिया है कि आरटीआई मामलों में आदेशों की अनदेखी को हल्के में नहीं लिया जाएगा।
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