देहरादून में फर्जी बैंक खाते, उत्तराखंड में 150 करोड़ के सरकारी आवंटन का आरोप, सहकारी संस्था पर गंभीर सवाल
उत्तराखंड में सरकारी निर्माण कार्यों से जुड़ी भारतीय को-ऑपरेटिव ग्रामीण विकास एवं निर्माण लिमिटेड को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। संस्था के पूर्व अध्यक्ष एवं निदेशक जितेंद्र कुमार अग्रवाल की ओर से दिए गए शपथपत्र में आरोप लगाया गया है कि संस्था को उत्तराखंड सरकार के विभिन्न विभागों में कार्यदायी संस्था के रूप में … The post देहरादून में फर्जी बैंक खाते, उत्तराखंड में 150 करोड़ के सरकारी आवंटन का आरोप, सहकारी संस्था पर गंभीर सवाल appeared first on Round The Watch.
उत्तराखंड में सरकारी निर्माण कार्यों से जुड़ी भारतीय को-ऑपरेटिव ग्रामीण विकास एवं निर्माण लिमिटेड को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। संस्था के पूर्व अध्यक्ष एवं निदेशक जितेंद्र कुमार अग्रवाल की ओर से दिए गए शपथपत्र में आरोप लगाया गया है कि संस्था को उत्तराखंड सरकार के विभिन्न विभागों में कार्यदायी संस्था के रूप में प्रस्तुत कर करीब 150 करोड़ रुपये के सरकारी धन, सेंटीज चार्ज, ब्याज और टेंडर से बची रकम के दुरुपयोग का रास्ता तैयार किया गया। शपथपत्र में देहरादून के दो बैंकों में संस्था के नाम से संचालित कई खातों को भी विवाद के केंद्र में रखा गया है।
मामले की गंभीरता इस बात से भी बढ़ती है कि शिकायत पर उत्तराखंड सरकार ने 2 जून 2026 को जांच के आदेश दिए। सचिव, नियोजन विभाग को जांच अधिकारी बनाया गया। इसके बाद जितेंद्र कुमार अग्रवाल ने हाईकोर्ट का रुख किया। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 3 अगस्त 2026 को याचिका का निस्तारण करते हुए जांच अधिकारी को जांच जल्द पूरी करने का निर्देश दिया।
देहरादून में बैंक खाते, यहीं से जुड़ी सबसे बड़ी कड़ी
शपथपत्र के मुताबिक संस्था की प्रबंध समिति का कार्यकाल 4 जनवरी 2024 को समाप्त हो चुका था। आरोप है कि इसके बाद वैध प्रबंध समिति के बिना कथित फर्जी प्रस्तावों और दस्तावेजों के आधार पर देहरादून में बैंक खाते खोले और संचालित किए गए।
शिकायत में बैंक ऑफ इंडिया, राजपुर रोड, देहरादून में दो खाते बताए गए हैं। इनके नंबर 705210210000008 और 705210110007493 हैं। इसी तरह एचडीएफसी बैंक, जाखन, राजपुर रोड, देहरादून में 50100744394602, 50100746405060 और 50100746399061 खातों का उल्लेख है।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि इन खातों के माध्यम से विभिन्न सरकारी विभागों से स्वीकृत धनराशि, सेंटीज चार्ज, खातों पर अर्जित ब्याज और न्यूनतम टेंडर से बची राशि का इस्तेमाल किया गया। शपथपत्र में इन गतिविधियों को गंभीर वित्तीय अनियमितता बताते हुए खातों को तत्काल रोकने और सरकारी धन की वसूली की मांग की गई है।
केवल देहरादून नहीं, कई जिलों में संस्था की भूमिका
मामले की एक महत्वपूर्ण कड़ी यह है कि संस्था का नाम उत्तराखंड के अलग-अलग जिलों के सरकारी निर्माण कार्यों में कार्यदायी संस्था के तौर पर सामने आता रहा है। ऊधमसिंह नगर के सितारगंज में जीआइसी के मिनी स्टेडियम के निर्माण के लिए भारतीय को-ऑपरेटिव ग्रामीण विकास एवं निर्माण लिमिटेड को कार्यदायी संस्था नामित किया गया था। परियोजना की लागत करीब 97.60 लाख रुपये बताई गई थी। अक्टूबर 2024 में इसका शिलान्यास किया गया था।
नई टिहरी में सुमन पार्क के सुंदरीकरण की योजना में भी इसी संस्था को कार्यदायी एजेंसी बताया गया। परियोजना की स्वीकृत लागत करीब 2.03 करोड़ रुपये थी और पहली किस्त के रूप में 81.56 लाख रुपये जारी किए जाने की जानकारी सामने आई थी। रानीखेत के जीआइसी सिलोर महादेव में मिनी स्टेडियम के लिए करीब 59.346 लाख रुपये की राशि संस्था के माध्यम से कार्यान्वित किए जाने का उल्लेख सामने आया था।
वहीं, चंपावत के जीआइसी मंच में खेल मैदान के विस्तार के लिए 54.88 लाख रुपये स्वीकृत होने और पहली किस्त के रूप में 32.90 लाख रुपये जारी होने की जानकारी सामने आई। उत्तराखंड के आधिकारिक ई-प्रोक्योरमेंट पोर्टल पर भी 2026-27 में जीआइसी मंच के फील्ड विस्तार के लिए इसी संस्था के नाम से निविदा दर्ज है।
यानी शिकायत में उठाया गया सवाल केवल किसी एक बैंक खाते तक सीमित नहीं है। सरकारी रिकॉर्ड और सार्वजनिक रिपोर्टों में संस्था की कार्यदायी भूमिका उत्तराखंड के अलग-अलग हिस्सों में दिखाई देती है। हालांकि, किसी परियोजना में संस्था का कार्यदायी एजेंसी होना अपने आप में वित्तीय गड़बड़ी का प्रमाण नहीं है। इन परियोजनाओं में वास्तविक खर्च, काम की गुणवत्ता, भुगतान और धन के अंतिम उपयोग की जांच से ही स्थिति स्पष्ट होगी।
नाम और पहचान को लेकर भी बड़ा सवाल
शपथपत्र में संस्था के नाम और उसकी पहचान को लेकर भी गंभीर आपत्ति दर्ज की गई है। शिकायतकर्ता ने केंद्र सरकार के 16 अगस्त 2016 के अधिसूचना आदेश तथा केंद्रीय रजिस्ट्रार सहकारी समितियों की ओर से जारी सार्वजनिक सूचना का हवाला देते हुए आरोप लगाया है कि संस्था के नाम और प्रस्तुतीकरण से सरकारी संस्था होने का भ्रम पैदा किया गया।
केंद्रीय स्तर पर जारी सार्वजनिक निर्देशों में मल्टी-स्टेट कोऑपरेटिव सोसाइटियों को सरकारी संस्था नहीं माना गया है और ऐसी संस्थाओं द्वारा सरकारी संरक्षण, स्वीकृति या संबद्धता का भ्रम पैदा करने वाले नाम, प्रतीक अथवा दावे किए जाने पर रोक की बात कही गई है।
शिकायतकर्ता का यह भी दावा है कि संबंधित संस्था को उत्तराखंड सरकार के विभागों में कार्यदायी संस्था के रूप में सूचीबद्ध कराया गया और इसी माध्यम से सरकारी कार्य हासिल किए गए। इन आरोपों की पुष्टि अथवा खंडन जांच पूरी होने के बाद ही हो सकेगा।
आरोपों में इन लोगों के नाम
शपथपत्र में पवन कुमार पांडे, आशीष कुमार पाठक, अनिल कुमार शुक्ला, सोमेश सिंह, विजय कुमार गोयल उर्फ वी. कुमार, शिवेंद्र प्रताप सिंह, मो. आमिर, संजय कुमार समेत अन्य लोगों के नाम आरोपों के संदर्भ में दर्ज किए गए हैं। इन लोगों पर कथित रूप से योजनाबद्ध तरीके से फर्जी लेटरहेड, दस्तावेज और प्रस्तावों के इस्तेमाल का आरोप लगाया गया है।
यह उल्लेख महत्वपूर्ण है कि शपथपत्र में किसी व्यक्ति का नाम आरोप के रूप में आना अपने आप में अपराध सिद्ध नहीं करता। संबंधित व्यक्तियों का पक्ष और जांच में सामने आने वाले दस्तावेज इस मामले की अंतिम स्थिति तय करेंगे।
शिकायत से हाईकोर्ट तक कैसे पहुंचा मामला
जितेंद्र कुमार अग्रवाल ने 14 मई 2026 को उत्तराखंड सरकार के संबंधित अधिकारियों के साथ केंद्रीय रजिस्ट्रार सहकारी समितियां, नई दिल्ली, महालेखाकार उत्तराखंड और अन्य सक्षम अधिकारियों को शिकायत भेजने की बात शपथपत्र में कही है।
इसके बाद 2 जून 2026 को जांच के आदेश हुए। जांच अधिकारी की नियुक्ति के बावजूद जांच पूरी होने में समय लगने पर मामला हाईकोर्ट पहुंचा। 3 अगस्त को हाईकोर्ट ने यह कहते हुए याचिका का निस्तारण किया कि जांच अधिकारी नियुक्त हो चुका है और उसे जांच जल्द पूरी करने का अनुरोध किया जाना पर्याप्त है।
जांच में इन सवालों के जवाब जरूरी
अब जांच के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही हैं कि 4 जनवरी 2024 के बाद संस्था की ओर से किसने बैंक खातों का संचालन किया, किन प्रस्तावों और दस्तावेजों के आधार पर खाते चलाए गए, उत्तराखंड के विभिन्न विभागों से कितनी राशि जारी हुई, कितनी राशि संबंधित परियोजनाओं पर खर्च हुई और कितनी राशि अन्य मदों में गई।
इसके साथ ही बैंक खातों के लेनदेन, सरकारी भुगतान, सेंटीज चार्ज, ब्याज, टेंडर से बची रकम और निर्माण कार्यों के वास्तविक भौतिक सत्यापन का मिलान भी अहम होगा। शिकायतकर्ता ने उच्चस्तरीय तकनीकी समिति से निर्माण कार्यों और रिकॉर्ड का ऑडिट, कथित खातों पर रोक, सरकारी धन की वसूली और दोषी पाए जाने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की मांग की है। जिस पर से पर्दा उठना अभी बाकी है।
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