उत्तराखंड वन विभाग में विवाद: संपत्ति विवरण ना भरने पर भी मिली पदोन्नति!
Rajkumar Dhiman, Dehradun: उत्तराखंड वन विभाग में आईएफएस अधिकारी रंजन कुमार मिश्रा की लेवल-17 पर पदोन्नति को लेकर कानूनी नोटिस के बाद प्रशासनिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठे हैं। आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी की ओर से 24 अगस्त 2026 को मुख्य सचिव को भेजे गए नोटिस में आरोप लगाया गया है कि मिश्रा ने वर्ष … The post सालों नहीं भरा संपत्ति का ब्यौरा, चार्जशीट की जगह मिला वन विभाग का सर्वोच्च पद! appeared first on Round The Watch.
उत्तराखंड वन विभाग में विवाद: संपत्ति विवरण ना भरने पर भी मिली पदोन्नति!
Rajkumar Dhiman, Dehradun: उत्तराखंड वन विभाग में आईएफएस अधिकारी रंजन कुमार मिश्रा की लेवल-17 पर पदोन्नति को लेकर कानूनी विवाद ने प्रशासनिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी ने 24 अगस्त 2026 को मुख्य सचिव को भेजे गए एक कानूनी नोटिस में आरोप लगाया है कि रंजन कुमार मिश्रा ने वर्ष 2017 से अचल संपत्ति विवरण (IPR) दाखिल नहीं किया, फिर भी उन्हें एपेक्स स्केल पर पदोन्नति दी गई। इस नोटिस में याचिका दायर करने के अलावा इस मामले की स्वतंत्र सीबीआई जांच और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की भी मांग की गई है।
देखें क्या है आरोप… Legal Notice
नियमों की अनदेखी का आरोप
नोटिस में भारतीय वन सेवा (वेतन) नियम, 2016 के संशोधित प्रावधानों का हवाला दिया गया है, जिसके तहत पिछले वर्ष का IPR 31 जनवरी तक भरना आवश्यक है। नोटिस में दावा किया गया है कि केंद्रीय सरकार के IPR स्टेटस मॉड्यूल के अनुसार, रंजन कुमार मिश्रा के नाम से वर्ष 2017 से कोई भी IPR दाखिल नहीं पाया गया। इसके अलावा, वर्ष 2023, 2024, 2025 और 2026 के लिए निर्धारित तारीखों पर भी कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
पदोन्नति के बदले कार्रवाई का अभाव
कानूनी नोटिस में कहा गया है कि केंद्रीय कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के दिशानिर्देशों के अनुसार, IPR दाखिल न करने पर विभागीय कार्रवाई शुरू करने का पर्याप्त आधार है। परंतु, मामले में कार्रवाई की बजाय रंजन कुमार मिश्रा की पदोन्नति की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया गया, जिससे सवाल उठते हैं कि क्या प्रशासनिक कार्रवाई में किसी प्रकार की साजिश तो नहीं हो रही है।
चयन समिति की भूमिका पर सवाल
नोटिस में यह भी कहा गया है कि दिसंबर 2025 में चयन समिति की बैठक में IPR के संबंध में मुद्दा ही नहीं उठाया गया, जबकि मिश्रा के नाम पर IPR की अनुपस्थिति थी। इसके बावजूद, चयन समिति ने उन्हें इंटीग्रिटी सर्टिफिकेट भी प्रदान किया, जिसे पूरी तरह से अनदेखा करके इस मामले को निपटाने का प्रयास किया गया है।
संपत्तियों की जांच की भी मांग
कानूनी नोटिस में कहा गया है कि लंबे समय तक IPR दाखिल न करने से संभावित संपत्तियों की सार्वजनिक जांच में बाधा उत्पन्न हो सकती है। इस आधार पर सीबीआई, ईडी और आयकर विभाग से संबंधित संपत्तियों की जांच कराने की मांग की गई है।
45 दिन में कार्रवाई की मांग
इस कानूनी नोटिस में संबंधित अभिलेखों को सुरक्षित रखने, स्वतंत्र सीबीआई जांच, पदोन्नति की पुनरावलोकन और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने की मांग की गई है। इसके साथ ही, विभागीय कार्रवाई और पेंशन संबंधी प्रावधानों के तहत आवश्यक कदम उठाने का अनुरोध भी किया गया है।
कम शब्दों में कहें तो, यह मामला उत्तराखंड वन विभाग में व्याप्त प्रशासनिक अनियमितताओं और निर्धारित नियमों की अनदेखी को उजागर करता है। ऐसे मामलों में पूरी तरह से पारदर्शिता की आवश्यकता है। अधिक अपडेट के लिए, हमारी वेबसाइट पर जाएँ Netaa Nagari
टीम नेटा नगरी, अनामिका शर्मा
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