16 वर्षों के बाद प्लॉट खरीदार को मिला न्याय, RERA ने बिल्डर पर कसे शिकंजे

Rajkumar Dhiman, Dehradun: उत्तराखंड रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (रेरा) ने 16 साल पुराने प्लॉट विवाद में खरीदार के पक्ष में बड़ा फैसला सुनाते हुए समिया इंटरनेशनल बिल्डर्स प्रा. लि. को 45 दिन के भीतर दो प्लॉटों का कब्जा देने, बिक्री विलेख (सेल डीड) निष्पादित करने और करीब 13 वर्षों की देरी का ब्याज अदा करने … The post 16 साल बाद प्लॉट खरीदार को मिला इंसाफ, बिल्डर पर RERA का शिकंजा, कब्जा देने और ब्याज चुकाने का आदेश appeared first on Round The Watch.

Jul 6, 2026 - 18:37
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16 वर्षों के बाद प्लॉट खरीदार को मिला न्याय, RERA ने बिल्डर पर कसे शिकंजे
16 वर्षों के बाद प्लॉट खरीदार को मिला न्याय, RERA ने बिल्डर पर कसे शिकंजे

16 वर्षों के बाद प्लॉट खरीदार को मिला न्याय

राजकुमार धीमान, देहरादून: उत्तराखंड रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण (रेरा) ने 16 साल पुराने प्लॉट विवाद में खरीदार के पक्ष में एक महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। इस आदेश में समिया इंटरनेशनल बिल्डर्स प्रा. लि. को 45 दिनों के भीतर दो प्लॉटों का कब्जा देने, बिक्री विलेख (सेल डीड) निष्पादित करने और लगभग 13 वर्षों की देरी का ब्याज चुकाने का निर्देश दिया गया है। यह निर्णय रेरा के अध्यक्ष नरेश सी मठपाल द्वारा जारी किया गया है। Breaking News, Daily Updates & Exclusive Stories - Netaa Nagari

कम शब्दों में कहें तो, रेरा ने खरीदार की मांग को सही मानते हुए बिल्डर को स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए हैं, ताकि खरीदारी के 16 वर्षों बाद भी खरीदार को अपने प्लॉट का कब्जा मिल सके।

दृश्यबद्धता और प्रकरण का विवरण

दिल्ली निवासी इंदु बाला सतीजा ने अपने अधिवक्ता धर्मवीर सतीजा के माध्यम से शिकायत दर्ज कराई थी। इंदु बाला ने वर्ष 2010 में उधमसिंह नगर के काशीपुर रोड पर स्थित 'समिया लेक सिटी' परियोजना के तहत गुलमोहर-3 में दो प्लॉट बुक कराए थे। उन्हें शुरू में प्लॉट संख्या C-1 और B-19 आवंटित किए गए, लेकिन बाद में C-1 के स्थान पर B-18 आवंटित किया गया।

दोनों प्लॉटों की मूल कीमत 2.89 लाख रुपये प्रति प्लॉट थी, और उन्होंने वर्ष 2013 तक सभी शुल्कों समेत कुल 6,45,500 रुपये का भुगतान कर दिया। बिल्डर ने 'नो ड्यूज' प्रमाण पत्र भी जारी किया और कब्जा देने की बात कही थी, लेकिन वर्षों बाद भी प्लॉट का कब्जा नहीं दिया गया।

सुनवाई का बदलता क्रम

सुनवाई के दौरान, रेरा ने बिल्डर को कई अवसर दिए, लेकिन उन्होंने न तो जबाब दिया और न ही कोई अधिकृत प्रतिनिधि सुनवाई में उपस्थित हुआ। इसके बाद, रेरा ने मामले की एकपक्षीय सुनवाई की और पाया कि शिकायतकर्ता ने सभी भुगतान समय पर कर दिए।

बिल्डर द्वारा खुद जारी किए गए 'नो ड्यूज' प्रमाण पत्र के आधार पर रेरा ने निर्णय लिया कि कब्जा न देना रेरा अधिनियम, 2016 की धारा 18 का उल्लंघन है।

रेरा का आदेश

रेरा ने स्पष्ट आदेश दिया कि बिल्डर 45 दिनों के भीतर सभी आवश्यक सुविधाओं के साथ प्लॉट संख्या B-18 (जिसे पूर्व में C-1 कहा जाता था) और B-19 का कब्जा वितरित करें। इसके अलावा, उन्हें 16 जनवरी 2013 से लेकर आदेश की तिथि तक 6,45,500 रुपये पर 10.80 प्रतिशत वार्षिक ब्याज का भुगतान करना होगा, जो कि भारतीय स्टेट बैंक की उच्चतम एमसीएलआर + 2% रहेगा। यदि बिल्डर निर्धारित समय में कब्जा नहीं देता है, तो उन्हें वास्तविक कब्जा मिलने तक अतिरिक्त विलंब ब्याज भी देना होगा।

कब्जा देने के एक माह के भीतर, दोनों प्लॉटों का बिक्री विलेख भी खरीददार के पक्ष में निष्पादित करना अनिवार्य होगा। इस फैसले के आने से न केवल इंदु बाला सतीजा की कानूनी लड़ाई को बल मिला है, बल्कि यह अन्य खरीदारों के लिए भी एक उम्मीद की किरण है।

निष्कर्ष

यह मामला रियल एस्टेट में खरीदारों के अधिकारों की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण पेश करता है। रेरा जैसे नोडल एजेंसियों की भूमिका इस प्रकार के मामलों में खरीदारों को न्याय दिलाने में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह निर्णय उन लोगों के लिए भी प्रेरणादायक है जो वर्षों से अपने अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

इस निर्णय से यह स्पष्ट होता है कि अगर बिल्डर अपनी जिम्मेदारियों को पूरा नहीं करता है, तो रेरा जैसी संस्थाएं खरीदारों को न्याय दिलाने के लिए सख्त कदम उठाने के लिए तैयार हैं।

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सप्रेम,
टीम नेटा नगरी
नीता शर्मा

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