सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाई कोर्ट की निष्पक्षता पर उठाए सवाल, भेदभाव झलकता है
Amit Bhatt, dehradun: उत्तराखंड के चर्चित प्रतीक रिसॉर्ट्स एंड बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड (एटीएस कॉलोनी से चर्चित) से जुड़े भूमि विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट की कार्यवाही पर गंभीर टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने कहा कि मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश पहले इसी भूमि से जुड़े वर्ष … The post सुप्रीम कोर्ट की उत्तराखंड हाई कोर्ट पर सख्त टिप्पणी, जिस कंपनी के लिए वकालत की, अब जज बनकर उसी के मामले में सुनवाई appeared first on Round The Watch.
सुप्रीम कोर्ट की उत्तराखंड हाई कोर्ट पर सख्त टिप्पणी
कम शब्दों में कहें तो: सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड हाई कोर्ट में प्रतीक रिसॉर्ट्स से जुड़े एक भूमि विवाद पर न केवल गंभीर टिप्पणियाँ की हैं बल्कि न्यायिक निष्पक्षता के मुद्दे पर भी सवाल उठाए हैं।
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Amit Bhatt, dehradun: उत्तराखंड के विवादास्पद प्रतीक रिसॉर्ट्स एंड बिल्डर्स प्राइवेट लिमिटेड से संबंधित भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण आदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने उत्तराखंड हाईकोर्ट की कार्यवाही पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश ने वर्ष 2013 में इसी कंपनी के पक्ष में वकील के रूप में काम किया था, जिससे न्याय की निष्पक्षता पर सवाल उठता है।
भूमि विवाद का क्रम
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आपराधिक रिट याचिका संख्या 762/2026 और 1431/2026 लंबित थीं। इनमें से याचिका संख्या 762/2026 में कई अंतरिम आदेश पारित किए गए थे, जिन्हें प्रतीक रिसॉर्ट्स ने विशेष अनुमति याचिका (SLP) के जरिए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि संबंधित न्यायाधीश वर्ष 2013 में WPMS संख्या 1478/2013 में प्रतीक रिसॉर्ट्स के वकील के रूप में पेश हुए थे। यह भूमि भी वर्तमान विवाद का विषय बनी हुई है।
न्याय का दिखना आवश्यक है
सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायपालिका की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए यह जरूरी है कि न्याय केवल किया ही न जाए, बल्कि यह जनता को दिखाई भी दे। अदालत ने कहा कि किसी पूर्व मुवक्किल से जुड़े मामले में आदेश पारित करना न्यायिक मर्यादा के अनुरूप नहीं माना जा सकता। इस संदर्भ में, न्यायाधीश को इस मामले की सुनवाई से आत्म-निर्वासन करने की आवश्यकता थी।
रिट याचिका का दायरा और जनहित
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि जिन रिट याचिकाओं पर सुनवाई हो रही थी, उनका विषय अलग था, लेकिन अंतरिम आदेशों के माध्यम से उनका दायरा बहुत बढ़ा दिया गया था। यदि न्यायाधीश को लगता था कि मामला व्यापक जनहित का है, तो उसे इसे हाईकोर्ट की जनहित याचिका (PIL) समिति के पास भेजना चाहिए था या फिर इसे मुख्य न्यायाधीश के पास ले जाना चाहिए था।
हाई कोर्ट के आदेशों में हस्तक्षेप नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल हाईकोर्ट के अंतरिम आदेशों को रद्द करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने कहा कि पेड़ों की कटाई नहीं करने संबंधी पहले ही आश्वासन दिए जा चुके हैं। इसलिए इस स्तर पर हस्तक्षेप उचित नहीं होगा। अब उचित पीठ इस मामले के सभी तथ्यों और कानून के पहलुओं की स्वतंत्र रूप से समीक्षा करेगी।
मुख्य न्यायाधीश को निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि उसका निर्णय उत्तराखंड हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को भेजा जाए, ताकि दोनों आपराधिक रिट याचिकाएं उचित पीठ के समक्ष सूचीबद्ध की जा सकें। साथ ही यदि जनहित याचिका शुरू करने की आवश्यकता हो, तो नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
विवाद की जड़ें
यह विवाद तब शुरू हुआ जब देहरादून के बिल्डर पुनीत अग्रवाल ने अपने खिलाफ गुंडा एक्ट के तहत जिला बदर किए जाने के आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उसी दौरान उन्होंने एटीएस कॉलोनी से जुड़े एक भूखंड में पेड़ कटान और अवैध प्लॉटिंग का आरोप लगाया था, जो प्रतीक रिसॉर्ट्स एंड बिल्डर्स के खिलाफ था। इस याचिका के संदर्भ में प्रतीक रिसॉर्ट्स ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दाखिल की थी, जिसमें अदालत की तीखी टिप्पणी आई।
फिलहाल, मामले की अगली कार्यवाही का इंतजार है, जिसमें अदालत ने उम्मीद जताई है कि न्याय की प्रक्रिया पारदर्शी और निष्पक्ष रहनी चाहिए। For more updates, visit Netaa Nagari.
Team Netaa Nagari, Nisha Sharma
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