‘मैं जमीन पर लहूलुहान पड़ा था और बेटे को आंखों के सामने मार दी गोली’ - एक त्रासदी की कहानी

Rajkumar Dhiman, Dehradun: 10 सितंबर 2014 की वह भयावह रात रिटायर्ड सहायक कृषि अधिकारी सुरेंद्र थपलियाल के जीवन में ऐसा जख्म दे गई, जो आज तक नहीं भर पाया। उस रात हुई निर्मम वारदात में उन्होंने अपने बेटे अंकित को अपनी आंखों के सामने खो दिया। वर्षों बाद जब इस हत्याकांड में शामिल मुख्य आरोपी … The post ‘मैं जमीन पर लहूलुहान पड़ा था और बेटे को आंखों के सामने मार दी गोली’  appeared first on Round The Watch.

May 1, 2026 - 09:37
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‘मैं जमीन पर लहूलुहान पड़ा था और बेटे को आंखों के सामने मार दी गोली’ - एक त्रासदी की कहानी
‘मैं जमीन पर लहूलुहान पड़ा था और बेटे को आंखों के सामने मार दी गोली’ - एक त्रासदी की कहानी

‘मैं जमीन पर लहूलुहान पड़ा था और बेटे को आंखों के सामने मार दी गोली’

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कम शब्दों में कहें तो, 10 सितंबर 2014 की एक रात ने रिटायर्ड सहायक कृषि अधिकारी सुरेंद्र थपलियाल का जीवन हमेशा के लिए बदल दिया। उस रात को हुई एक भयानक घटना में उन्होंने अपने बेटे अंकित को अपनी आंखों के सामने खो दिया था। यह घटना उनसे जुड़े जख्मों को आज तक भर नहीं पाई है।

रात का खौफनाक मंजर

राजकुमार धिमान, देहरादून से। सवेरे लगभग 4 बजे सुरेंद्र थपलियाल ने अपने घर के बाहर कुछ हलचल सुनी। जैसे ही उन्होंने खिड़की से झांका, एक व्यक्ति डंडा लिए बाहर खड़ा दिखाई दिया। सुरेंद्र ने तुरंत दरवाजे की ओर बढ़ते हुए चटखनी बंद करने का सोचते ही देखा कि अचानक एक बदमाश जोर से धक्का देकर अंदर आ गया।

परिवार के सदस्यों की आवाज सुनते ही, सुरेंद्र की पत्नी अंजनी और सास विंदेश्वरी भी बाहर आईं, लेकिन बदमाशों ने उन्हें भी बुरी तरह घायल कर दिया। इस हमले में सुरेंद्र को सिर पर डंडे से वार कर गंभीर रूप से घायल किया गया।

अंकित का साहस

इस हंगामे को सुनकर सुरेंद्र का बेटा अंकित भी बाहर आया और हमलावर से भिड़ गया। अंकित अपने साहस के साथ हमलावर पर भारी पड़ रहा था, लेकिन तभी उसके पांच साथी खिड़की से घर में घुस आए। उन्हें किसी तरह अंकित को पकड़ लिया और अकरम ने उसे गोली मार दी। माता-पिता के सामने ही अंकित ने दम तोड़ दिया।

पूरे क्षेत्र में भय का माहौल

यह घटना नकरौंदा क्षेत्र में दहशत का माहौल पैदा कर गई। स्थानीय लोग इस निर्मम घटना के खिलाफ प्रदर्शन करने लगे और तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत ने पीड़ित परिवार से मिलने का फैसला किया। सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए उसी दिन शाम को बालावाला में पुलिस चौकी स्थापित की गई।

अधूरे वादे

इस घटना के बाद लोगों ने अपने घरों में लकड़ी की बजाय लोहे की खिड़कियां लगवाने का निर्णय लिया। स्थानीय निवासी नीतू देवरानी के अनुसार, सरकार ने आश्वासन दिया था कि दुलहनी नदी क्षेत्र में सुरक्षा दीवार बनाई जाएगी, लेकिन यह वादा अब तक अधूरा है।

यादों के साये में जीते मुख्य पात्र

समय के साथ सुरेंद्र थपलियाल की आंखों में स्थायी उदासी बस गई है। उनकी पत्नी अंजनी भी अपने बेटे को याद कर गहरे गम में डूब जाती हैं। अंकित, चार बहनों का इकलौता भाई और परिवार का सबसे छोटा सदस्य था। आज भी, उनके ड्राइंग रूम में अंकित की तस्वीर टंगी हुई है, जहां माता-पिता उस तस्वीर के सामने खड़े होकर तन्हाई में बिता रहे हैं। इस घटना ने न केवल एक परिवार की बल्कि पूरे समुदाय की जीवनशैली को प्रभावित किया है।

आत्मीयता और दर्द की इस कहानी ने साबित किया है कि कितनी आसानी से एक पल में सब कुछ बदल सकता है। सुरेंद्र और अंजनी का संघर्ष आज भी जारी है, जो बताता है कि इंसान कितना मजबूर और करुणामय हो सकता है।

अभी भी यह सवाल उठता है कि न्याय कब मिलेगा? यह घटना केवल एक त्रासदी नहीं थी, बल्कि एक चेतावनी थी कि कुछ भी हो सकता है। ऐसे में, हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करना कितना आवश्यक है।

दृश्य और आँसू: सुरेंद्र थपलियाल और अंजनी के लिए यह एक ऐसा जख्म है जो कभी नहीं भरेगा। आज भी उनकी आंखों में अंकित की तस्वीर के सामने खड़ा होने का दर्द झलकता है, जो एक परिवार की स्थायी सुनिश्चितता का प्रतीक बन गया है।

टीम नेटा नागरी की ओर से इस त्रासद घटना की गहराई में जाकर जानकारी साझा की गई है। हमारी अनमोल सूचनाओं के लिए जुड़े रहें और अधिक अपडेट के लिए यहां क्लिक करें.

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