जेनी को लेकर आई सफेद स्कॉर्पियो ने बढ़ाया रहस्य, नंबर प्लेट गायब और बोनट पर लगा था झंडे का स्टिकर

Rajkumar Dhiman, Dehradun: करीब 23 साल पुराने जेनी प्रकरण में शनिवार को उत्तरांचल प्रेस क्लब में हुई पत्रकार वार्ता के बाद अब एक सफेद रंग की स्कॉर्पियो भी चर्चा के केंद्र में आ गई है। इंदिरा देउरी उर्फ जेनी इसी कार से प्रेस क्लब पहुंची थीं। कार की स्थिति और चालक के व्यवहार ने कई … The post जेनी को लेकर आई सफेद स्कॉर्पियो ने बढ़ाया रहस्य, नंबर प्लेट गायब और बोनट पर लगा था झंडे का स्टिकर appeared first on Round The Watch.

Nov 8, 2026 - 00:37
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जेनी को लेकर आई सफेद स्कॉर्पियो ने बढ़ाया रहस्य, नंबर प्लेट गायब और बोनट पर लगा था झंडे का स्टिकर

Rajkumar Dhiman, Dehradun: करीब 23 साल पुराने जेनी प्रकरण में शनिवार को उत्तरांचल प्रेस क्लब में हुई पत्रकार वार्ता के बाद अब एक सफेद रंग की स्कॉर्पियो भी चर्चा के केंद्र में आ गई है। इंदिरा देउरी उर्फ जेनी इसी कार से प्रेस क्लब पहुंची थीं। कार की स्थिति और चालक के व्यवहार ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सामने आए घटनाक्रम के मुताबिक, स्कॉर्पियो पर नंबर प्लेट नहीं थी, जबकि नंबर प्लेट लगाने का फ्रेम मौजूद था। बोनट पर एक झंडे का स्टिकर भी दिखाई दिया। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि कार चला रहा व्यक्ति मास्क पहने था और मीडिया के कैमरों से बचने के लिए सीट पर पीछे की ओर धंस गया था।

प्रेस कॉन्फ्रेंस समाप्त होने के बाद जब स्कॉर्पियो रवाना हुई तो मीडिया कर्मियों की नजर उसके टायरों पर भी पड़ी। उपलब्ध तस्वीर और घटनाक्रम के आधार पर टायर काफी घिसे हुए दिखाई देने की बात सामने आई है। इससे यह सवाल भी उठा कि क्या कार ने लंबी दूरी तय की थी। हालांकि, केवल टायरों की स्थिति से वाहन की यात्रा या उसके इस्तेमाल की अवधि तय नहीं की जा सकती।

कार पर नंबर प्लेट न होने और नंबर प्लेट का फ्रेम मौजूद होने से वाहन की पहचान को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। बोनट पर लगे झंडे के स्टिकर और चालक के कैमरों से बचने के व्यवहार ने मामले को और रहस्यमयी बना दिया। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि स्कॉर्पियो किसकी है, इसे कौन लेकर आया था और चालक की पहचान क्या है। इन सवालों का जवाब वाहन के पंजीकरण, स्वामित्व और मौके पर मौजूद लोगों की जानकारी से ही मिल सकता है।

जेनी का देहरादून आकर पत्रकार वार्ता करना और इतने वर्षों बाद पुराने आरोपों को फिर दोहराना पहले ही राजनीतिक हलचल पैदा कर चुका है। अब उनके पहुंचने के लिए इस्तेमाल हुई कार की परिस्थितियों ने घटनाक्रम को नया मोड़ दे दिया है। हालांकि, कार की स्थिति या चालक के व्यवहार के आधार पर किसी राजनीतिक दल, नेता अथवा व्यक्ति की भूमिका तय करना उचित नहीं होगा। इसके लिए स्वतंत्र पुष्टि और ठोस साक्ष्य जरूरी हैं।

स्कॉर्पियो की पहचान से खुल सकते हैं कई सवाल
जेनी की पत्रकार वार्ता के बाद अब सफेद स्कॉर्पियो की पहचान भी जांच और पड़ताल का विषय बन सकती है। वाहन पर नंबर प्लेट नहीं होने, बोनट पर झंडे का स्टिकर लगे होने और चालक के मास्क पहनकर कैमरों से बचने के घटनाक्रम को लेकर सवाल उठ रहे हैं। यह भी स्पष्ट होना बाकी है कि कार किसके नाम पर पंजीकृत है और उसे प्रेस क्लब तक कौन लेकर आया था।

क्या यह वाहन जेनी को देहरादून लाने के लिए इस्तेमाल किया गया था या स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कराया गया था? नंबर प्लेट क्यों नहीं लगी थी? चालक अपनी पहचान छिपाने की कोशिश क्यों कर रहा था? क्या प्रेस क्लब पहुंचने से पहले भी कार इसी तरह बिना नंबर प्लेट के चल रही थी? इन सवालों के जवाब वाहन की पहचान और संबंधित लोगों से पूछताछ के बाद ही मिल सकते हैं।

फिलहाल जेनी के नए आरोप, 23 साल पुराने सीबीआइ प्रकरण, उस पर सीओ को सौंपी गई जांच, हरक सिंह के पलटवार और पत्रकार वार्ता में इस्तेमाल हुई स्कॉर्पियो—पांचों पहलू चर्चा में हैं। इस पूरे घटनाक्रम में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अलग पुराने जांच अभिलेखों, नए दावों और वाहन से जुड़े तथ्यों की निष्पक्ष पड़ताल जरूरी है।

23 साल बाद हरक सिंह रावत पर फिर लगाया दुष्कर्म का आरोप, विस्तार से जानिए
उत्तरांचल प्रेस क्लब में पत्रकार वार्ता के दौरान जेनी ने पूर्व मंत्री डॉ. हरक सिंह रावत पर दुष्कर्म का आरोप दोहराया। उन्होंने कहा कि उनका ऐसा शोषण हुआ, जैसा शायद किसी अन्य महिला के साथ नहीं हुआ होगा। जेनी ने दावा किया कि उन्हें मानसिक अस्पताल में रखा गया और वहां उनसे जबरन हस्ताक्षर कराए गए।

उन्होंने कहा कि जिस समय उन्हें मानसिक अस्पताल में रखा गया, उनकी मानसिक स्थिति बेहद खराब हो चुकी थी। उनका आरोप है कि सीबीआइ के अधिकारी उनसे मिलने केवल एक बार अस्पताल आए थे। उस समय वह पूरी तरह मानसिक रूप से टूट चुकी थीं। उन्होंने सवाल उठाया कि उस समय उनकी परिस्थितियों और मानसिक स्थिति को समझने का प्रयास क्यों नहीं किया गया। इन आरोपों के समर्थन में प्रस्तुत दस्तावेजों और संबंधित अस्पताल के अभिलेखों की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है।

‘मेरा बेटा 23 साल से बिना पिता के रह रहा, उसे नाम चाहिए’
पत्रकार वार्ता में जेनी ने अपने 23 वर्षीय बेटे का जिक्र करते हुए कहा कि वह इतने वर्षों से पिता के नाम और पहचान के बिना जीवन बिता रहा है। उन्होंने कहा कि उनके बेटे को उसका नाम मिलना चाहिए। जेनी ने बेटे का डीएनए परीक्षण कराने की मांग भी उठाई। उनका कहना था कि इतने वर्षों से उनके बच्चे की पहचान को लेकर राजनीति होती रही, लेकिन किसी ने उसके भविष्य और अधिकारों की चिंता नहीं की।

उन्होंने हरक सिंह रावत पर दुष्कर्म का आरोप दोहराते हुए कहा कि कथित शोषण के बाद उन्हें मानसिक और सामाजिक रूप से भी प्रताड़ना झेलनी पड़ी। जबरन हस्ताक्षर कराए जाने के आरोप लगाते हुए उन्होंने पुराने घटनाक्रम की परिस्थितियों पर सवाल उठाए। जेनी के इन नए बयानों पर हरक सिंह रावत का पक्ष और उनके दावों के समर्थन में उपलब्ध साक्ष्य महत्वपूर्ण होंगे।

दिसंबर 2002 में देहरादून पहुंची थीं जेनी, जून 2003 में दिया था बच्चे को जन्म
जेनी प्रकरण की शुरुआत वर्ष 2002 के आखिर में हुई थी। उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, असम की रहने वाली इंदिरा देउरी उर्फ जेनी दिसंबर 2002 में देहरादून पहुंची थीं। उस समय उत्तराखंड में नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार थी और डॉ. हरक सिंह रावत राजस्व मंत्री थे।

जेनी ने आरोप लगाया था कि नौकरी दिलाने का भरोसा देकर उनके साथ शारीरिक संबंध बनाए गए और बाद में उन्हें सरकारी आवास में रखा गया। 15 जून 2003 को उन्होंने देहरादून के एक सरकारी अस्पताल में बच्चे को जन्म दिया। इसके बाद उन्होंने हरक सिंह रावत को बच्चे का पिता बताते हुए यौन शोषण का आरोप लगाया।

18 जून 2003 को यह मामला विधानसभा में गूंजा। विपक्ष ने सदन में सरकार को घेरा और मामले की निष्पक्ष जांच की मांग उठाई। विवाद बढ़ने के बीच हरक सिंह रावत ने मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। उन्होंने आरोपों को राजनीतिक साजिश बताया और कहा था कि जब तक वह बेदाग साबित नहीं होते, तब तक विधानसभा में प्रवेश नहीं करेंगे।

सीबीआइ ने दर्ज किया था दुष्कर्म का मुकदमा, डीएनए रिपोर्ट से बदला घटनाक्रम
मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने सीबीआइ जांच की संस्तुति की थी। सीबीआइ ने जांच के दौरान जेनी और अन्य संबंधित लोगों के बयान दर्ज किए। 25 जुलाई 2003 को जेनी के बयान के आधार पर हरक सिंह रावत के खिलाफ दुष्कर्म का मुकदमा दर्ज किया गया था।

जांच के दौरान बच्चे और हरक सिंह रावत के डीएनए नमूनों का परीक्षण कराया गया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, दोनों के नमूनों का मिलान नहीं हुआ। इसके बाद बच्चे का जैविक पिता होने के आरोप में हरक सिंह रावत को क्लीन चिट मिलने की जानकारी सार्वजनिक हुई। हरक सिंह रावत ने भी इस रिपोर्ट को अपनी बेगुनाही का आधार बताया था।

हालांकि, डीएनए परीक्षण का निष्कर्ष बच्चे के जैविक पितृत्व से संबंधित था। इसे जेनी के प्रत्येक दूसरे आरोप का स्वतः खंडन नहीं माना जा सकता। पितृत्व और यौन शोषण के आरोप कानूनी रूप से अलग-अलग विषय हैं। पुराने मुकदमे के अंतिम निस्तारण और सीबीआइ की क्लोजर रिपोर्ट का मूल अभिलेख देखना इस प्रकरण की पूरी कानूनी स्थिति समझने के लिए आवश्यक है।

संरक्षण गृह में 12 लाख रुपये देने की पेशकश का भी आया था मामला
वर्ष 2003 में ही इस प्रकरण में एक और विवाद सामने आया था। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, जेनी के संरक्षण गृह में रहने के दौरान एक कर्मचारी पर उन्हें शिकायत वापस लेने के लिए 12 लाख रुपये देने की पेशकश करने का आरोप लगा था।

आरोप था कि संरक्षण गृह की एक कर्मचारी 16 अगस्त को जेनी के पास रकम और एक बिना हस्ताक्षर वाला शपथपत्र लेकर पहुंची थी। तत्कालीन प्रशासनिक जांच में संरक्षण गृह की एक रसोइया सरोज पर आरोप सही पाए जाने की जानकारी सामने आई थी। इसके बाद उसे स्थानांतरित करने और जांच रिपोर्ट सीबीआइ को भेजने का निर्णय हुआ था। हरक सिंह रावत ने उस समय इस तरह की रकम देने की पेशकश से खुद को अलग बताया था।

2016 में जेनी ने हरीश रावत पर लगाए थे उकसाने के आरोप
करीब 13 साल बाद वर्ष 2016 में यह प्रकरण फिर सुर्खियों में आया। इस बार जेनी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत और उनके सहयोगियों पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया था कि उन्हें हरक सिंह रावत के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने के लिए उकसाया गया था।

इसके बाद मुख्यमंत्री के निजी सचिव कमल सिंह रावत की शिकायत पर देहरादून में जेनी के खिलाफ आपराधिक षड्यंत्र, झूठे साक्ष्य और रंगदारी से संबंधित धाराओं में मुकदमा दर्ज होने की जानकारी सामने आई थी। पुलिस ने उनकी तलाश शुरू की, लेकिन उनका मोबाइल बंद मिला और दिल्ली में बताया गया पता भी सही नहीं पाया गया। उस समय पुलिस को उनकी तलाश में सफलता नहीं मिली थी।

इस घटनाक्रम ने पुराने प्रकरण को नया राजनीतिक मोड़ दे दिया था। एक ओर हरक सिंह रावत पहले से लगे आरोपों को राजनीतिक साजिश बताते रहे, वहीं दूसरी ओर जेनी ने भी तत्कालीन सरकार के कुछ लोगों पर आरोप लगाए।

अक्टूबर-नवंबर 2026 में फिर शुरू हुई राजनीतिक बयानबाजी
करीब एक दशक बाद अक्टूबर 2026 में जेनी प्रकरण फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हल्द्वानी में इस पुराने मामले का उल्लेख करते हुए कांग्रेस पर निशाना साधा। इसके बाद भाजपा प्रदेश अध्यक्ष एवं राज्यसभा सदस्य महेंद्र भट्ट ने भी बच्चे के पिता की पहचान को लेकर सवाल उठाए।

इस पर हरक सिंह रावत ने पलटवार करते हुए कहा कि उनका डीएनए परीक्षण पहले ही हो चुका है और जांच में वह निर्दोष साबित हुए हैं। उन्होंने महेंद्र भट्ट को भी डीएनए परीक्षण कराने की चुनौती दी। हरक सिंह रावत ने सार्वजनिक रूप से अपनी बेगुनाही दोहराते हुए कहा कि उन्होंने जेनी को कभी छुआ तक नहीं और उनके खिलाफ लगाए गए आरोप राजनीतिक साजिश का हिस्सा हैं।

लगातार राजनीतिक बयानबाजी के बीच जेनी के नाम से इंटरनेट मीडिया पर एक वीडियो भी सामने आया। इसमें उन्होंने नेताओं से उनके नाम पर राजनीति बंद करने की अपील की थी। उन्होंने कहा था कि इतने वर्षों में किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि वर्ष 2003 में उनके साथ वास्तव में क्या हुआ था। उन्होंने अपने दस्तावेज और साक्ष्य सार्वजनिक करने की बात कही थी।

इसके बाद सात नवंबर को उत्तरांचल प्रेस क्लब में पत्रकार वार्ता कर उन्होंने नए आरोप लगाए। मानसिक अस्पताल में रखे जाने, जबरन हस्ताक्षर कराने और सीबीआइ अधिकारियों के केवल एक बार मिलने आने के दावे के साथ उन्होंने अपने बेटे के लिए पिता का नाम और डीएनए परीक्षण की मांग दोहराई।

स्कॉर्पियो की पहचान से खुल सकते हैं कई सवाल
जेनी की पत्रकार वार्ता के बाद अब सफेद स्कॉर्पियो की पहचान भी जांच और पड़ताल का विषय बन सकती है। वाहन पर नंबर प्लेट नहीं होने, बोनट पर झंडे का स्टिकर लगे होने और चालक के मास्क पहनकर कैमरों से बचने के घटनाक्रम को लेकर सवाल उठ रहे हैं। यह भी स्पष्ट होना बाकी है कि कार किसके नाम पर पंजीकृत है और उसे प्रेस क्लब तक कौन लेकर आया था।

क्या यह वाहन जेनी को देहरादून लाने के लिए इस्तेमाल किया गया था या स्थानीय स्तर पर उपलब्ध कराया गया था? नंबर प्लेट क्यों नहीं लगी थी? चालक अपनी पहचान छिपाने की कोशिश क्यों कर रहा था? क्या प्रेस क्लब पहुंचने से पहले भी कार इसी तरह बिना नंबर प्लेट के चल रही थी? इन सवालों के जवाब वाहन की पहचान और संबंधित लोगों से पूछताछ के बाद ही मिल सकते हैं।

फिलहाल जेनी के नए आरोप, 23 साल पुराने सीबीआइ प्रकरण, उस पर सीओ को सौंपी गई जांच, हरक सिंह के पलटवार और पत्रकार वार्ता में इस्तेमाल हुई स्कॉर्पियो—पांचों पहलू चर्चा में हैं। इस पूरे घटनाक्रम में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से अलग पुराने जांच अभिलेखों, नए दावों और वाहन से जुड़े तथ्यों की निष्पक्ष पड़ताल जरूरी है।

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