‘स्वस्थ बचपन-स्वस्थ भारत’ अभियान: सुरक्षित दूध से वैज्ञानिक दुग्ध सुरक्षा प्रणाली विकसित करने का समय - उत्तराखंड

देहरादून उत्तराखंड सरकार के द्वारा नकली, मिलावटी और असुरक्षित होने के साथ ही कृत्रिम दूध को आमजन के बीच प्रयोग रोकने को लेकर खाद्य सुरक्षा विभाग और सरकार को बधाइयां…

Aug 8, 2026 - 18:37
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‘स्वस्थ बचपन-स्वस्थ भारत’ अभियान: सुरक्षित दूध से वैज्ञानिक दुग्ध सुरक्षा प्रणाली विकसित करने का समय - उत्तराखंड
‘स्वस्थ बचपन-स्वस्थ भारत’ अभियान: सुरक्षित दूध से वैज्ञानिक दुग्ध सुरक्षा प्रणाली विकसित करने का समय - उत्तराखंड

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कम शब्दों में कहें तो, उत्तराखंड सरकार खाद्य सुरक्षा विभाग के माध्यम से नकली और असुरक्षित दूध के खिलाफ मजबूत कदम उठा रही है, लेकिन इसके साथ ही इसे एक व्यापक जन स्वास्थ्य अभियान में तब्दील करने की आवश्यकता है।

देहरादून: उत्तराखंड सरकार ने नकली, मिलावटी और असुरक्षित कृत्रिम दूध के उपयोग को रोकने के लिए खाद्य सुरक्षा विभाग पर भरोसा करते हुए सराहनीय कदम उठाए हैं। इस संदर्भ में, खाद्य सुरक्षा विभाग और संबंधित अधिकारियों को बधाई दी जा रही है। विशेष रूप से संस्था के अध्यक्ष डॉ. बृजमोहन शर्मा ने इस पहल की सराहना की है। उन्होंने कहा कि सरकार ने कठोर कदम उठाए हैं, जो निश्चित रूप से जन स्वास्थ्य और पोषण से जुड़े मुद्दों के लिए अनिवार्य हैं।

दूध की शुद्धता की स्थायी आवश्यकता

दूध भारतीय परिवारों की आहार का मुख्य अंग होता है। बच्चों से लेकर वयस्कों तक दूध, दही, पनीर आदि का दैनिक उपयोग होता है। इसलिए, दूध की शुद्धता और गुणवत्ता केवल उपभोक्ता की पसंद का मामला नहीं है, बल्कि यह बाल विकास और पोषण सुरक्षा से जुड़ा हुआ है।

स्पेक्स का इतिहास और योगदान

सोसाइटी ऑफ पॉल्यूशन एंड एनवायरनमेंटल कंजर्वेशन साइंटिस्ट्स (स्पेक्स), देहरादून का गठन 1994 में हुआ था, लेकिन इसके द्वारा मिलावट पर परीक्षण 1990 के दशक से शुरू कर दिए गए थे। इस संस्था ने खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता की जांच करने के लिए विभिन्न स्तरों पर नमूने एकत्रित किए हैं और उनके विश्लेषण के परिणामों को जनसमुदाय और संबंधित संस्थाओं के पास पहुंचाने का कार्य किया है।

दूध में मिलावट की समस्या

दूध में हुई मिलावट के मामलों में पानी मिलाना सबसे आम है, लेकिन इसके अलावा स्टार्च, यूरिया और डिटर्जेंट जैसे खतरनाक पदार्थों के उपयोग की भी रिपोर्टें सामने आई हैं।

खुला दूध और पैक दूध: एक स्पष्टता

दुग्ध सुरक्षा पर चर्चा करते समय यह ध्यान में रखना चाहिए कि खुला दूध अपने आप में असुरक्षित नहीं होता। यदि दूध स्वच्छता के मानदंडों के अनुसार निकाला गया है, तो उसकी असुरक्षा का निर्धारण केवल उसकी बिक्री के तरीके से नहीं किया जा सकता।

दूध परीक्षण केंद्रों की आवश्यकता

स्पेक्स ने सुझाव दिया है कि उत्तराखंड सरकार को हर जिले में दूध परीक्षण और जागरूकता केंद्र स्थापित करने की आवश्यकता है। इस प्रकार की व्यवस्था उपभोक्ताओं को बेहतर सेवाएं मुहैया कराएगी।

‘स्वस्थ बचपन—स्वस्थ भारत’ अभियान की कल्पना

उत्तराखंड में 'स्वस्थ बचपन—स्वस्थ भारत' नाम से एक व्यापक जन जागरूकता अभियान का आरंभ होना चाहिए, जो मुख्य रूप से दूध की गुणवत्ता, खाद्य सुरक्षा और पोषण पर केंद्रित हो। विद्यालयों को इस अभियान का महत्वपूर्ण केंद्र बनाना आवश्यक है। इस उद्देश्य के लिए, महिला स्वयं सहायता समूहों, ग्राम पंचायतों और अन्य स्थानीय संगठनों को भी शामिल किया जा सकता है।

नकली दुग्ध उत्पादों के खिलाफ कठोर कार्रवाई

कृत्रिम दूध उत्पादों के खिलाफ शून्य सहनशीलता की नीति अपनाना आवश्यक है। प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सीधे उपभोक्ता को धोखा देने वाले तत्वों के खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए।

समुदाय को ‘दुग्ध प्रहरी’ बनाना

दुग्ध सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल सरकारी अधिकारियों की नहीं है। नागरिकों को भी इस प्रक्रिया में एक सक्रिय भागीदार बनाया जाना चाहिए। इस संबंध में जागरूक नागरिकों को 'दुग्ध प्रहरी' की भूमिका निभाने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।

उत्तराखंड अन्य राज्यों के लिए उदाहरण बन सकता है

अंततः, यदि उत्तराखंड सरकार इन पहलों को कार्यान्वित करने में सफल हो जाती है, तो यह न केवल मिलावट विरोधी प्रयासों को सुदृढ़ कर सकती है, बल्कि एक सम्पूर्ण और वैज्ञानिक दुग्ध सुरक्षा प्रणालियों का मॉडल विकसित करने में भी सफल हो सकती है।

इस प्रकार, सुरक्षित दूध, स्वस्थ बचपन एवं स्वस्थ भारत के लिए एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण की आवश्यकता है।

अधिक जानकारी के लिए, हमारी वेबसाइट पर जाएं: https://netaanagari.com

सादर, टीम नेटaa नागरी
अनुजा जोशी

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