नंदा की चौकी पुल प्रकरण: हिमालयन कंस्ट्रक्शन पर गिरी गाज, ठेकेदार निलंबित
Amit Bhatt, Dehradun: नंदा की चौकी में टौंस नदी पर बने पुल की एप्रोच रोड क्षतिग्रस्त होने के मामले में लोक निर्माण विभाग ने अब कार्रवाई का दायरा बढ़ा दिया है। विभागीय अभियंताओं के बाद निर्माण कार्य करने वाली ठेका फर्म मैसर्स हिमालयन कंस्ट्रक्शन, देहरादून पर भी गाज गिरी है। प्रमुख अभियंता राजेश शर्मा ने … The post नंदा की चौकी पुल प्रकरण में ठेकेदार पर भी गिरी गाज, हिमालयन कंस्ट्रक्शन सस्पेंड appeared first on Round The Watch.
नंदा की चौकी पुल प्रकरण: हिमालयन कंस्ट्रक्शन पर गिरी गाज, ठेकेदार निलंबित
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कम शब्दों में कहें तो, नंदा की चौकी में टौंस नदी पर बने पुल की एप्रोच रोड की क्षति के मामले में लोक निर्माण विभाग ने ठेकेदार हिमालयन कंस्ट्रक्शन को निलंबित कर दिया है, जबकि पहले ही कई अभियंताओं के खिलाफ कार्रवाई की जा चुकी है। यह कदम सुरक्षा और निर्माण गुणवत्ता को लेकर कई सवालों के उठने के बाद उठाया गया है।
Amit Bhatt, Dehradun: नंदा की चौकी में टौंस नदी पर बने पुल की एप्रोच रोड के क्षतिग्रस्त होने के मामले में लोक निर्माण विभाग ने कार्रवाई का दायरा बढ़ा दिया है। विभागीय अभियंताओं के साथ-साथ निर्माण कार्य करने वाली ठेका फर्म मैसर्स हिमालयन कंस्ट्रक्शन पर भी गाज गिराने का निर्णय लिया गया है। प्रमुख अभियंता राजेश शर्मा ने क्षेत्रीय मुख्य अभियंता की प्रारंभिक जांच रिपोर्ट के आधार पर कंपनी को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है।
कंपनी को अगले आदेश तक उत्तराखंड लोक निर्माण विभाग की निविदा प्रक्रिया में भाग लेने से भी रोक दिया गया है। यह प्रतिबंध तब तक प्रभावी रहेगा जब तक पुल के आसपास नदी कटाव की वास्तविक गहराई का वैज्ञानिक आकलन और उससे जुड़ी जांच पूरी नहीं हो जाती।
आगे की कार्रवाई
इससे पहले शुक्रवार को लोनिवि प्रांतीय खंड के अधिशासी अभियंता राजेश कुमार, सहायक अभियंता अमित त्यागी और अपर सहायक अभियंता/जेई नवीन गैरोला के खिलाफ भी निलंबन की कार्रवाई की गई थी। ठेका फर्म के खिलाफ हुई कार्रवाई इस बात को स्पष्ट करती है कि विभाग इस मामले में जिम्मेदारी का दायरा केवल अपने अभियंताओं तक सीमित नहीं रखना चाहता।
28 जुलाई की बाढ़ में हुआ नुकसान
टौंस नदी पर बने पुल के पुनर्निर्माण और सुदृढ़ीकरण का कार्य 31 जनवरी 2026 को हुए अनुबंध के अनुसार मैसर्स हिमालयन कंस्ट्रक्शन को सौंपा गया था। 28 जुलाई को भारी वर्षा के बाद नदी का जलस्तर अचानक बढ़ गया, जिससे पुल की सुरक्षा दीवार के नीचे कटाव हो गया।
कटाव इतना गंभीर था कि एप्रोच रोड का हिस्सा टूट गया। घटना के बाद पुल की सुरक्षा और निर्माण कार्य की गुणवत्ता को लेकर सवाल उठे और शासन के निर्देश पर मामले की प्रारंभिक जांच की गई।
गंभीर जांच का सामना
मुख्य अभियंता की प्रारंभिक जांच में बताया गया कि एप्रोच रोड को नुकसान पहुंचाने का प्रमुख कारण टौंस नदी में हुआ भारी कटाव था। लेकिन सबसे गंभीर सवाल अभी भी खुला है कि नदी ने जमीन के नीचे कितनी गहराई तक कटाव किया, इसका सही आकलन नहीं हो सका है।
इसका जवाब जानने के लिए भू-भेदी रडार (Ground Penetrating Radar) और विद्युत प्रतिरोधकता परीक्षण (Electrical Resistivity Testing) कराने की आवश्यकता बताई गई है। इन वैज्ञानिक परीक्षणों से यह स्पष्ट होगा कि नदी ने पुल और एप्रोच रोड के आसपास जमीन की सतह के नीचे किस स्तर तक कटाव किया है और संरचना की नींव के आसपास की स्थिति क्या है।
जिम्मेदारी का दायरा बढ़ता जा रहा है
विभाग ने इसी तकनीकी अनिश्चितता को ध्यान में रखते हुए हिमालयन कंस्ट्रक्शन के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की है। जब तक जांच पूरी नहीं होती और नदी कटाव की वास्तविक गहराई सामने नहीं आती, तब तक कंपनी विभाग की नई निविदा प्रक्रिया में हिस्सा नहीं ले सकेगी।
अभियंताओं के बाद अब कंसल्टेंट पर भी सवाल
इस मामले में पहले विभागीय अभियंताओं पर कार्रवाई की गई थी। बाद में उत्तराखंड डिप्लोमा इंजीनियर्स संघ ने ठेकेदार के साथ-साथ डिजाइन तैयार करने वाले कंसल्टेंट की भूमिका की भी जांच कराने की मांग उठाई।
संघ का तर्क था कि यदि नदी के प्रवाह को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त तकनीकी उपाय नहीं किए गए, तो इससे पुल के ऊपरी धारा वाले हिस्से में कटाव का खतरा बढ़ सकता था। अब ठेका फर्म के खिलाफ हुई कार्रवाई के बाद जांच की अगली कड़ी डिजाइन और तकनीकी सलाह से जुड़े पक्षों तक पहुंच सकती है।
किसकी कितनी जिम्मेदारी?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि एप्रोच रोड को नुकसान केवल प्राकृतिक आपदा का परिणाम था या निर्माण और डिजाइन से जुड़ी तकनीकी खामियों ने भी नुकसान को बढ़ाया। इसके लिए कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर आगे की जांच होगी-
- नदी के वास्तविक कटाव की गहराई क्या थी?
- पुल और एप्रोच रोड के आसपास की जमीन की स्थिति क्या है?
- नदी के तेज बहाव को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त सुरक्षात्मक उपाय किए गए थे या नहीं?
- निर्माण कार्य में निर्धारित तकनीकी मानकों का पालन हुआ या नहीं?
- डिजाइन तैयार करने वाले कंसल्टेंट की भूमिका क्या रही?
- डिजाइन की तकनीकी जांच और निगरानी में किस स्तर पर जिम्मेदारी थी?
- विभागीय अधिकारियों ने निर्माण की निगरानी किस तरह की?
भविष्य की रणनीति
विभाग फिलहाल जल्दबाजी में सुधारात्मक कार्य कराने के बजाय पहले नदी तल की वास्तविक स्थिति समझना चाहता है। इसके लिए भू-भेदी रडार और विद्युत प्रतिरोधकता परीक्षण करने की तैयारी है। इन परीक्षणों से संभावित कटाव और संरचना की स्थिति का वैज्ञानिक आकलन किया जाएगा।
इस प्रकार विभाग का ध्यान केवल टूटी एप्रोच रोड को फिर से बनाने पर नहीं, बल्कि यह जानने पर है कि उसके नीचे और आसपास की संरचना कितनी सुरक्षित है।
सर्किल स्तर तक कार्रवाई की आंच
जांच का फोकस अब केवल निचले स्तर के अभियंताओं से आगे बढ़कर ठेका फर्म, डिजाइन और सुरक्षात्मक कार्यों तक पहुंच रहा है। यदि जांच में कोई चूक पाई जाती है, तो उच्च स्तर के अधिकारियों की भूमिका को भी जांच के दायरे में लाया जा सकता है।
यानी नंदा की चौकी पुल प्रकरण में यह स्पष्ट है कि मामला केवल बारिश और नदी कटाव तक सीमित नहीं रह गया है; मामला सभी संबंधित पक्षों की जिम्मेदारी की परतों तक जा पहुंचा है।
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सादर,
टीम नेटा नगरी
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